निस्बत

वो अंधेरों में पुकारता है नाम रोज़ मेरा
हम है के उज्जालो में सफर किया करते है

वो रुमाल के गाँठ में दबा है इश्क़ मेरा
हम है के आसमान ओढ़कर चला करते है

वो छुपा रखे है मेरे यादों की वो जुगनूवे
हम है के सूरज को जला कर दिया करते है

वो फेकते है लिख के पथरो में हर्फ़ मेरा
हम है के सितारों को जेबों में भरा करते है

वो अश्कों में बटोरे फिरते है जहान मेरा
हम है के उसे हर सुखन में ढूढ़ा करते है

 

मानव

मृत्यु

मृत्यु अटल सत्य है, और हर सत्य की तरह यह भी असहनीय होता है| सृजन और काल जैसे धूप और साया, जैसे रात और दिन, एक के बिन दूसरे का अस्तित्व नहीं और एक के गुजर जाने के उपरान्त अगले का उदय निश्चित| पर कितना आसान है यह उस वक़्त समझना जब मौत किसी अपनों को दस्तक दे? उस वेदना को कोई किन शब्दों में वर्णन करे!

बरसो बात न हो, मुलाकात न हो, पर यह एहसास के कभी तो मिल लेंगे, कभी तो बात हो जाएगी, सब एक पल में कितना झूठमूठ हो जाता है जब उसके न होने की खबर मिले| एक ऐसा रिक्त भर जाता है पुरे शरीर में, मानो उनमे रक्त नहीं हवा दौड़ रही हो| एक पल के लिए जैसे लगता है कोई खेल चल रहा हो और यह क्षण भर के लिए रुक गया हो| अभी सब ठीक हो जायेगा, अभी वो उठ कर कहेगा के “अब तेरी बरी”|

हा, मृत्यु एक पड़ाव है, मालूम नहीं के मर के कहा जाते है, लेकिन जो रह जाते है उनकी अगली सुबह बिलकुल अलग होती|  कुछ भी वैसे नहीं रहा जाता, सब कुछ बदल जाता है | जो हर वक़्त समीप था, पास न हो कर भी हर गम और हर ख़ुशी में शामिल था, उसका यु बिना अलविदा कहे चले जाना, उन आखिरी पल में साथ का न होना, जैसे हज़ारो अनकहे बात छुपा कर सो जाना, कैसा अजीब यात्रा का अंत है| जिन्हे पलकों में रखा और दिलो में आशना दिया उन सब को झांझोट कर, अधमरा छोड़ कर, ऐसा कौन जाता है?

 

यह क्या हुआ है मुझे

यह क्या हुआ है मुझे
बेसुध सा गुजर रहा
बेख्याल वक़्त का
बेवक़्त ख्याल कुछ
धामे डोर कोई
बांधे गठान कुछ
चलने का आस नही
रुकने का ख्याल नही
अभी क्या मैं जग रहा
या कभी सोया नही
जैसे रूठे हुए होठों में
ठहरी हुई है प्यास कोई

यह क्या हुआ है मुझे
बेसुध सा गुजर रहा
बेख्याल वक़्त का
बेवक़्त ख्याल कुछ
अभी तो सब ठीक था
कैसे थम गया है सब
धड़कनों में जा कही
फसी रही है साँस मेरी
तेज़ तेज़ है हवा
सुर्ख सुर्ख आंख है
हाथ से छूटती
जर्द जर्द दर्द है
फासलों में सुकून है
वेदनाओं में दरमियां

यह क्या हुआ है मुझे
बेसुध सा गुजर रहा
बेख्याल वक़्त का
बेवक़्त ख्याल कुछ

मानव

३६५ दिन महिला दिवस होना चाहिए

मैंने कई बार कहा है के “अगले जन्म मुझे बिटिया ही कीजो”| ऐसा नहीं के मुझे नहीं मालूम के कितना मुश्किल है स्त्री होना, आप चाहे किसी भी देश की औरत हो, आपकी मुसीबतों में कोई कमी नहीं होगी| पर अब मुझे लगता है के मेरी बिटिया ये जोखिम ले सकती है तो मैं भी देखना चाहूंगा के कैसे दुनिया भर की औरतें संघर्ष कर रही है अपना अस्तित्व बचाने के लिए| अगर आपका जीवन सरल और सहूलियत से भरा है तो उन बाकि बची ८०% औरतों के लिए जरूर प्रार्थना करे, क्यों कि, १०० में से ८० महिलाये अपने साँस लेने की कीमत चुका रही है, जिल्लत से, अपने लहू से, गरीबी और भूख से| विषय की गंभीरता इन आकड़ों से भी देखा जा सकता है :

  •  ३५% महिलाये शारीरक और यौन उत्पीड़न का शिकार होती है गैर मर्दो से और ७०% महिलाएं अपने अंतरंग साथी का शिकार होती है
  • २०१७ में ८७,००० औरतें मारी गई अपने अंतरंग साथी और परिवार वालो के हाथो से, मतलब १३७ महिलाओ का कत्ल हर रोज़, यह दुनियाभर की आंकड़े है |
  • ५१% व्यस्क स्त्री मानव तस्करी का शिकार होती है, और अवस्य्क बच्चो को जोड़ जिया जाए तो आंकड़े ७१% तक हो जाती है  मतलब अगर कत्ल से बच गई तो तस्करी कर दिए जाओगे |
  • बाल विवाह का चलन काफी कम हुआ है मगर आज भी दुनिया भर में करीब ६० करोड़ लड़कियों का विवाह हर साल उनके व्यस्क होने से पहले ही कर दी जाती है |
  • करीब २० करोड़ लड़कियों का जनन विकृति (Genital Mutilation) का शिकार होती है|
  • अमूमन हर साल १.५ करोड़ बच्चियों का रेप होता है, इनमे से कईओ की उम्र साल भर का भी नहीं होता है |
  • १० में से ८ महिलाये साइबर उत्पीड़न का शिकार होती है | व्हाट्सप्प और फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट और मोबाइल एप्प में यौन रूप से स्पष्ट मेसेजस और तस्वीर भेज कर उत्पीड़ित करते है |
  • हर ५ में से ३ महिलाये अपने कार्यस्थल में शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न का शिकार होती है | उनमे वो महिलाये भी शामिल है जो कामयाबी की बुलंदी में है|

उत्पीड़न की लिस्ट बड़ी लम्बी है और जीवन तकलीफ भी है, पर इसका मतलब यह नहीं के हर जगह अँधेरा है| महिलाओं ने एक लम्बी लड़ाई लड़ी है अपने हक़ और वज़ूद के लिए| अपने आसपास कामियाब और सशक्त महिलाओ को देखता हु तो बड़ा गर्व होता है | हम सब कि कामयाबी तब तक अधूरी है जब तक हर एक महिला सुरक्षित, सेहतमंद, शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हो जाती| एक औरत से घर बनता है, घर से समाज, समाज से राज, राज़ से राष्ट्र और राष्ट्र से जग| इस जग का सृजन औरत से है तो उसका पालनहार भी औरत से ही है, इसलिय जब तक एक स्त्री का विकास नहीं होता, सब का कल्याण रुका है |

तू संभावना है नए विस्तार की,
तू चेतना है हर नए विचार की।
तू टूट न जाना किसी भी विकराल से
तू स्पंदन है इस जगत के विकास की|

मानव

 

 

 

तू अब भी मेरे लिए एक अफ़सरा है

कई बार देखा , पर मन नहीं भरा है
तू अब भी मेरे लिए एक अफ़सरा है
वही रेशम अभी भी है बातो में
धरा पे पहली बूंदों सी महक सासो में
माना कोई भी नहीं हु मैं तेरा
तेरी अस्मा कही, कही जमी मेरा
इन्द्रधनुस के दो छोर से है हम
जो मुस्करानते रंगो से भरा है
तू अब भी मेरे लिए एक अफ़सरा है
कई बार देखा  पर मन नहीं भरा है
मानव

Education is knowing yourself.

The world needs peace, progress, social cohesion and spirit to live together. If we shape education on the principles of ancient Indian school of thought we will be in a position to prepare our youth for learning to live together. There is a need to expose our young generation to ideas of universal love, tolerance, and peace. “We have to work to remove orthodoxy and obsolescence orientations. There is a need to offer holistic education with multiple dimensions of human personality. There is a need that education should provide experiences which would reduce hatred, bigotry, fundamentalism fanaticism, greed, and jealousy.”

The Gita in a subtle way gives prominence to self-directed, self-generated, self-initiated learning. It says one should raise oneself with own efforts. One should realize one’s goals and aims through one’s own karma. Metaphysically speaking, it means realization and actualization of self is through yourself only. The process of education has to be self-directed and self-generated. The sense of fulfillment by self-efforts was the core of ancient education. The “Learning To Be” (UNESCO 1972) mentions that man is an unfinished being and can only fulfill himself through constant learning. If this is so then education takes place at all ages of life, in all situations and in all circumstances of existence. Education must transcend its limits of institutions, programmes, and methods. And this concept was presented in all ancient literature on education.

Ancient Indian thinking never credited formal institutionalized learning. In one of the slokas, four sources of education have been identified through which learning takes place: It says “one-fourth of the learning is done when the student is with the teacher, one-fourth of learning by the learner’s self-study and self-reflection. One-fourth of the learning results by peer interaction and the last one fourth comes out of time context.

 

एक बार मैं सायना हो गया

इन गुजरे नए सालो में “मैं” क्या क्या हुआ

एक बार मैं सायना हो गया
दूजी बार सहेतमंद हो गया
हद हो गई जब मैं देशभक्त हो गया
कुछ दिन क्रांतिकारी रहा
फिर राष्ट्रवादी हो गया
सेक्युलर बना फिर हिन्दू हो गया
कुछ दिन मास खाया फिर शाकाहारी हो गया
कभी ज्ञान पेले, कभी अधियात्म
कभी सिर्फ दूध पिये, कभी सिर्फ रम
गम भुलाने की बूटी भी रखी
कभी खुशियों को खर्चने का हौसला हो गया

एक बार मैं बेहूदा हो गया
दूजी बार हैंडसम हो गया
हद हो गई जब इस बात का यकीं हो गया
कुछ दिन निडर रहा
फिर जग कठोर हो गया
हँसमुख बना फिर गंभीर हो गया
कुछ दिन हँस बोल लिया फिर अंतर्मुखी हो गया
कभी रहे अकेले, कभी मलंग
कभी सिर्फ धर्म किया, कभी सिर्फ कलंक
भूल जाने की बात भी रखी
कभी यादों को सज़ा कर खिलौना हो गया।

एक बार मैं सायना हो गया..

मानव

जाम खत्म किये बैठा हूँ

आज फिर उसकी याद आई
आज फिर एक खत लिखते है
बयां कर ही देंगे आज हाल-ए-दिल
और बना देंगे उस खत से एक नाव
बहा देंगे अपने खुवाईशो के समंदर में उसे
जाए खुद से टकरा जाए उनसे वो
और कही मिल जाए तो कह देना
अब इंतेज़ार खत्म किये बैठा हूँ
के मैं अब जाम खत्म किये बैठा हूँ

मानव

नही!

अपनो ने पहचाना नही
दोस्तो ने जाना नही
दुनिया ने समझा नही
इश्क़ न अपनाया नही

सब के साथ मैं चलता नही
हर किसी से मिलता नही
मिल गया तो मुझसा नही
वरना मुझ को पूछना नही

अब किसी की सुनता नही
ख्वाइशों को रोकता नही
सपनों पर पाबंदी नही
कदमों के पीछे चलता नही

मेरे पीछे आना नही
आ गए तो रुकना नही
रुक जाओ तो पुकारना नही
खो गया तो ढूढ़ना नही

नहीं रहा तो रोना नही
रास्ता मेरा तकना नही
रात भर का जगना नही
उम्मीद पे बैठे रहना नही

कोई किसी का अपना नही
बंधन में बंध जाना नही
झूठे कसमें खाना नही
जब तक खुद को जाना नही

मानव

यादों का पुल

तेरी याद जब करीब से गुजरती है
खुद को टूटे पुल पर खड़ा पाता हु
आगे की सुध न पीछे का खयाल
मैं लड़खड़ाता हु घबरा सा जाता हु

अंधाधुन्द गए वक़्त की परछाईया,
बेबस लौटते सिपाही की, नवेली दुल्हन की तरह जकड़ लेती है।
नरम उंगलियों की एहसास, अब भी तेरे होने का ज़िद करता है।

मेरे काँपते होंठ,
तुम्हरे चुम्बनों का हस्ताक्षर लिए, दर दर पता पूछती फिरती है

उन आसमानों में ढूढ़ती है, फिर से वही दूधिया खरगोश,
चार आँखों ने जिनको सुबह से शाम,
रंगों से बुना,
पीछा किया।

अब शाम हो चली है
घर आने को देर न करना।
इंतेज़ार
खत्म कर दो मेरा!
हाथ पकड़ कर,
पुल पार करा दो प्रिय।

मानव