थोड़ा मेरा भी कनु

तुम
निश्छल हँसी में बाँध मुझे
के जैसे मिल जाओगे मेरे स्वास में आ कर कही से
अल्हड़ सी तुझ में खो रही हु
जग के ताने बाने में उलझ कर फिर से
इस बार भी मुझे भूल जाओगे,
तुम

मैं ,
अब भी पुकारती हु तुम्हे
के जैसे आ जाओगे तुम अभी निकल कर कही से
फिर सुनाओगे वही बासुरी की धुन
जिस से मदहोश हो कर फिर से
खुद को भूल जाऊंगी,
मैं

राजेश कुट्टन ‘मानव’

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