तासीर

नींद क्यों रात भर ठहर के आती है
शायद अब भी मुझे वो ढूढ़ता होगा

आँखे उसके सपने क्यों बुन लेती है
उसकी बातों मे अब भी रेशम होगा

बेसब्री वक़्त बे-वक़्त रोक लेती है
वो मेरे बारे में अक्सर सोचता होगा

तन्हाई में रहना अब अच्छा लगता है
मेरी तस्वीरों से वो बाते करता होगा

राजेश कुट्टन “मानव”

पशेमान

तुलसी के पत्तो को हाथो में रगड़ना
मुझे बहुत याद आता है तेरे झगड़ना
रहते थे सारा दिन गुमसुम बेखबर
वो बेवक़्त रोकना वो बेवजह छेड़ना

सब झूठे एक तू ही सच्चा लगता रहा
सब छोड़ कर तू मुझ से लिपटा रहा

वो टिफ़िन के ड़िब्बे को आहिस्ता रगड़ना
मुझे बहुत याद आता है तेरा मुझे ढूढ़ना
खेलते थे सारा दिन रहते इधर उधर
वो खाने को पूछना वो जिद्द से खिलाना

सब रह गए साथ, तू किधर गुम हुआ
सब उज्जले अंधेरो में, तब्दिल हुआ

छत को कागज़ और थर्मोकोल से सजाना
तेरे सब निशानिया दिवार पर चिपकाना
अंधेरो में यादो की जुगनु जैसे जलते रहे
वो रातो को सपनो की दुकाने लगाना

राजेश कुट्टन “मानव”



ख़त-ए-ख़ता

मेरे मेहबूब तु हुस्न-ए-बहार ही सही
महकता तुम्हरा जिस्म मेरे राख से है
मुझे बांध भले जज़्बातों के तारो से तू
सिसकता तुम्हरा रूह मेरे इश्फ़ाक़ से है

तेरे आग़ोश में है जो मेरे क़फ़स का क़र्ज़
वो रौशनी तुम्हारे मेरे जलते ख्व़ाब से है
मुझे दफ़ना देना किसी अँधेरे गर्द में अब
चीखें तुम्हारे कान में मेरे गिर्दाब से है

राजेश कुट्टन “मानव”

*क़फ़स= शरीर
*इश्फ़ाक़ = दया,
*गिर्दाब= भंवर, बवंडर

नाबूद-ए-नदीम

हम जिसके झूठ को आदिल कर गए
उसी पर मेरे यार ने मक्का बना दिया

एक कमरे के दीवार पर सारा जहां मेरा
उसी पर मेरे यार ने इस्तहार छपा दिया

मेरी जरूरतों से भी छोटा था मेरा बटुआ
उसी पर मेरे यार ने कब्ज़ा जमा लिया

दुनिया से तंग मैं, मेरे सिर्फ चंद लोग
उसे भी मेरे यार ने जहन्नुम बना दिया

राजेश कुट्टन ‘मानव’



थोड़ा मेरा भी कनु

तुम
निश्छल हँसी में बाँध मुझे
के जैसे मिल जाओगे मेरे स्वास में आ कर कही से
अल्हड़ सी तुझ में खो रही हु
जग के ताने बाने में उलझ कर फिर से
इस बार भी मुझे भूल जाओगे,
तुम

मैं ,
अब भी पुकारती हु तुम्हे
के जैसे आ जाओगे तुम अभी निकल कर कही से
फिर सुनाओगे वही बासुरी की धुन
जिस से मदहोश हो कर फिर से
खुद को भूल जाऊंगी,
मैं

राजेश कुट्टन ‘मानव’

अजनबी

पानी में तेल की बारिश कर गए, लिपट कर वो मुझे अपना कर गए
हम है के उन्हें बरसो पुकारते रहे, वो है के हम को किनारा कर गए

उसने जताया भी बताया भी ठुकराया भी, हर अदा हक़ से अता कर गए
हम चुप रहे सब सहे अजनबी रहे, हर सितम वफ़ा को अदा कर गए

वो करीब आ कर भी नजदीक न हुए, वो दूर रह कर मुझे बिखरा कर गए
आसमान बनके छाये जब भी दूर रहे, वो आगो़श में जब आये जर्रा कर गए

~ राजेश कुट्टन ‘मानव’



मेरे ७ जीवन सूत्र

अपनी चाहत किसी इंसान तक पहुंचने की कभी नहीं रखो | हमेशा कोशिश करो के जो भी मिले उस से स्नेह सम्मान के साथ मिले, वो हमे याद रहे न रहे पर सामने वाले पर प्रभाव छोड़ जाये | गांधीजी की वो लाइन के “जो सम्मान आप अपने लिए चाहते हो वो आप दूसरे को दो” चरित्रात करते रहे | किसी के साथ भी भेदभाव नहीं करो | ये सब वो है जो आप को नित करना है लेकिन यहां मेरे जीवन के अनुभव से कुछ साँझा कर रहा हु जो आप को हमेशा याद रखना है और सख्ती से पालन करना है :

१. आप के अपने ख़ुशी और सम्मान से बड़ा कुछ नहीं है, न माँ बाप, न भाई बहन, न ही बड़े सच्चे से लगने वाले वो दोस्त और न ही सबरे शाम आप पर मर मिटने वाली कसमे खाने वाली आपकी बीवी/गर्ल फ्रेंड /पति/बॉय फ्रेंड और न ही जिगर के टुकड़े से लगने वाले आप के बच्चे अगर आप माता या पिता है | आप के जीवन का केंद्र बिंदु जब तक आप खुद नहीं होंगे तब तक सभी मोह माया की दौड़ व्यर्थ है | ज़िन्दगी दुसरो के लिए खपाने के लिए नहीं है, ज़िदगी खुद को जानने और प्रकाशित करने के लिए होता है और सफर में आने वाले अगर इसमें रोड़ा बनते है तो उन्हें वक़्त रहते अलविदा कह देना चाहिए, ज़रा सी भी देरी आपको सफर में भटका सकती है |

२. आप का किया हुआ कोई भी कार्य व्यर्थ नहीं है, लिए हुए निर्णय पर खेद करना मूर्खता है | अपने अनुभवों को कुंठा की पोटली न बनाये बल्कि अलंकार बनाकर धारण करे |

३. अगर जीवन में निर्णय लेना हो और असमंजस में हो, तो कभी भी खुद को चोट पहुंचाने वाला निर्णय न करे | निर्णय लेने में वक़्त लगता है तो लगने दे, और इस बीच कुछ छूट जाता है तो जाने दे, मंथन में जहर और अमृत का पता चलता है |

४. दुसरो के शर्तो पर नौकरी तक ठीक है, उसके अलावा कुछ भी आप को कमज़ोर और नपुंसक बनता है |

५. जीवन को सही और गलत के पैमानों में कभी न तौलो | सही और गलत सिर्फ नजरिया है जो वक़्त के साथ अपना मुखौटा बदलता रहता है | अपना सच खुद ढूंढो और जीओ |

६. किसी भी रिश्ते, विचारधारा या भाव को कभी भी खुद से ज्यादा मोल मत दो | जीवन हर वक़्त नए सम्भावनो को जन्म देता रहता है, यहां कुछ भी स्थाइ नहीं है | थोड़ा इंतज़ार करो और सब बदलते देखो |

७. एक साधु ने अमरकंटक के जंगलो में मुझे बड़ा ज्ञान दिया था, “बेटा कभी मल मूत्र के पीछे मत जाना, जीवन उसमे नहीं है” | अच्छा भोजन हो या ख़ूबसूरत शरीर, सिर्फ भोग तक उचित है, इसका दिन रात विवेचना करते रहना मार्ग से दिग्भर्मित करता है |

आप कभी भी निराश हो, हारा महसूस कर रहे हो और कुछ रास्ता नहीं सुझ रहा हो, तो आप मुझ से बात कर सकते है | मैं जरूर आऊंगा आपकी मदद के लिए | आप मुझे लिख सकते है iamrajeshkuttan@gmail.com या व्हाट्सप्प मैसेज कर सकते है +971559856752 पर | याद रहे आप सा ख़ूबसूरत और जानदार कुछ इस जटिल संसार में है तो वो आप खुद है |

निस्बत

वो अंधेरों में पुकारता है नाम रोज़ मेरा
हम है के उज्जालो में सफर किया करते है

वो रुमाल के गाँठ में दबा है इश्क़ मेरा
हम है के आसमान ओढ़कर चला करते है

वो छुपा रखे है मेरे यादों की वो जुगनूवे
हम है के सूरज को जला कर दिया करते है

वो फेकते है लिख के पथरो में हर्फ़ मेरा
हम है के सितारों को जेबों में भरा करते है

वो अश्कों में बटोरे फिरते है जहान मेरा
हम है के उसे हर सुखन में ढूढ़ा करते है

 

मानव

मृत्यु

मृत्यु अटल सत्य है, और हर सत्य की तरह यह भी असहनीय होता है| सृजन और काल जैसे धूप और साया, जैसे रात और दिन, एक के बिन दूसरे का अस्तित्व नहीं और एक के गुजर जाने के उपरान्त अगले का उदय निश्चित| पर कितना आसान है यह उस वक़्त समझना जब मौत किसी अपनों को दस्तक दे? उस वेदना को कोई किन शब्दों में वर्णन करे!

बरसो बात न हो, मुलाकात न हो, पर यह एहसास के कभी तो मिल लेंगे, कभी तो बात हो जाएगी, सब एक पल में कितना झूठमूठ हो जाता है जब उसके न होने की खबर मिले| एक ऐसा रिक्त भर जाता है पुरे शरीर में, मानो उनमे रक्त नहीं हवा दौड़ रही हो| एक पल के लिए जैसे लगता है कोई खेल चल रहा हो और यह क्षण भर के लिए रुक गया हो| अभी सब ठीक हो जायेगा, अभी वो उठ कर कहेगा के “अब तेरी बरी”|

हा, मृत्यु एक पड़ाव है, मालूम नहीं के मर के कहा जाते है, लेकिन जो रह जाते है उनकी अगली सुबह बिलकुल अलग होती|  कुछ भी वैसे नहीं रहा जाता, सब कुछ बदल जाता है | जो हर वक़्त समीप था, पास न हो कर भी हर गम और हर ख़ुशी में शामिल था, उसका यु बिना अलविदा कहे चले जाना, उन आखिरी पल में साथ का न होना, जैसे हज़ारो अनकहे बात छुपा कर सो जाना, कैसा अजीब यात्रा का अंत है| जिन्हे पलकों में रखा और दिलो में आशना दिया उन सब को झांझोट कर, अधमरा छोड़ कर, ऐसा कौन जाता है?

 

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